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पिता के सिद्धांतों से प्रेरित निशांत की नई राजनीतिक पारी, ईमानदारी और आध्यात्म से गढ़ी सोच अब जदयू की राजनीति में

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पटना। बिहार की राजनीति में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने औपचारिक रूप से जनता दल (यू) की सदस्यता ली तो यह केवल एक राजनीतिक घटना भर नहीं रही, बल्कि इसके पीछे पिता-पुत्र के रिश्ते, विश्वास और मूल्यों की एक अलग कहानी भी सामने आई। निशांत कुमार हमेशा से यह कहते रहे हैं कि वे अपने आपको सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें नीतीश कुमार जैसे पिता मिले। उनके अनुसार पिता की सेवा करने का अवसर भी उनके लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है।
निशांत कुमार अपने पिता के व्यक्तित्व के जिस पहलू से सबसे अधिक प्रभावित हैं, वह उनकी ईमानदारी है। वे कई मौकों पर कह चुके हैं कि राजनीतिक जीवन हो या निजी जीवन, उन्होंने अपने पिता को हमेशा ईमानदारी के रास्ते पर अडिग देखा है। एक पुत्र के रूप में उन्हें अपने पिता को बहुत करीब से समझने और देखने का मौका मिला है, इसलिए उनके प्रति उनका सम्मान केवल पारिवारिक भावनाओं तक सीमित नहीं बल्कि एक आदर्श के रूप में भी है। जदयू की सदस्यता लेने के बाद भी उन्होंने यही कहा कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है और उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिला है।
निशांत कुमार का स्वभाव अपने पिता से कुछ अलग भी माना जाता है। जहां नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से बहुत कम धार्मिक अनुष्ठानों में दिखाई देते हैं, वहीं निशांत का झुकाव अध्यात्म की ओर अधिक रहा है। वे अक्सर पटना जंक्शन के पास स्थित महावीर मंदिर में पूजा करने जाते रहे हैं। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के बावजूद उनकी रुचि धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों के अध्ययन में रही है। वे नियमित रूप से भगवद्गीता पढ़ते हैं और आध्यात्मिक विषयों पर गहरी दिलचस्पी रखते हैं।
बताया जाता है कि उनके भीतर यह आध्यात्मिक प्रवृत्ति काफी हद तक उनकी मां से आई। परिवार में धार्मिक परंपराओं को लेकर उनकी मां का विशेष आग्रह रहा था। निशांत ने एक बार बताया था कि जब उनका जन्म हुआ था तो परिवार के किसी करीबी ने उनकी मां को पूजा कराने की सलाह दी थी। इसके बाद उनकी मां हर जन्मदिन पर पूजा कराती थीं और गरीबों को भोजन कराती थीं। वर्ष 2007 में मां के निधन के बाद भी यह परंपरा जारी रही और अब उनके पिता इस परंपरा को निभाते हैं।
राजनीति में आने से पहले निशांत का जीवन अपेक्षाकृत शांत और अध्ययनशील रहा। वे खाली समय में भजन सुनना और किताबें पढ़ना पसंद करते थे। उनके अध्ययन का दायरा भी काफी व्यापक रहा है। धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ उन्होंने समाजवाद, दर्शन और विभिन्न विचारधाराओं से जुड़ी किताबें भी पढ़ीं। वे ओशो जैसे दार्शनिकों की रचनाओं में भी रुचि रखते रहे हैं। कहा जाता है कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी साहित्यिक सामग्री भी पढ़ी और समाजवादी विचारधारा पर लिखी पुस्तकों का भी अध्ययन किया। इस तरह विभिन्न विचारों को समझने की उनकी जिज्ञासा ने उन्हें वैचारिक रूप से एक संतुलित और मजबूत व्यक्ति बनाया।
दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार ने कभी भी अपने पुत्र के अध्ययन या विचारों पर कोई रोक-टोक नहीं लगाई। उन्होंने हमेशा उन्हें अपनी सोच विकसित करने की स्वतंत्रता दी। शायद यही खुलापन पिता और पुत्र के रिश्ते को और मजबूत बनाता गया।
कुछ वर्ष पहले तक निशांत खुद यह कहते थे कि उन्हें राजनीति में कोई विशेष रुचि नहीं है और उनका झुकाव अध्यात्म की ओर है। वर्ष 2017 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा भी था कि उनका रास्ता राजनीति नहीं बल्कि आध्यात्म है। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और जदयू के भीतर यह चर्चा तेज होती गई कि पार्टी के भविष्य को देखते हुए निशांत को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। धीरे-धीरे ऐसा माहौल बना कि उन्हें राजनीति में कदम रखना पड़ा।
निशांत के राजनीति में आने के साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इस बदलाव की कीमत नीतीश कुमार ने खुद चुकाई है। मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा की ओर जाने का फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला रहा। राजनीतिक हलकों में इसे एक पिता के बड़े त्याग के रूप में भी देखा जा रहा है। क्योंकि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का कद ऐसा रहा है कि उन्हें पद छोड़ने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता था।
ऐसे में पिता-पुत्र के बीच दिखने वाला यह विश्वास और सम्मान मौजूदा राजनीतिक माहौल में काफी अलग नजर आता है। निशांत कुमार की नई राजनीतिक पारी को अब इसी नजरिए से देखा जा रहा है कि क्या वे अपने पिता की ईमानदारी और सामाजिक संतुलन की राजनीति को आगे बढ़ा पाएंगे। फिलहाल उनकी एंट्री ने बिहार की राजनीति में एक नई चर्चा और नई संभावनाओं का दरवाजा जरूर खोल दिया है।

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